आत्मा अमर होती है। यह सिद्धांत सनातन सहित दुनिया के लगभग सभी धर्म और मान्यताओं में स्थापित है। सनातन धर्म में मृत्यु के बाद के संस्कार इसी अमरत्व के सिद्धांत पर आधारित है। भारत के सनातनी शरीर छोड़ चुकी आत्मा को गाजे बाजे के साथ हरिद्वार में गंगा नदी में प्रवाहित करते है और उनका तर्पण करते है। सनातन में इसी आत्मा के अमरत्व के सिद्धांत का एक और रूप है आत्मा को पितृ के रूप में स्थापित कर उनकी आराधना करना।
परिवारजन स्थापित पितृ की जीवित व्यक्ति की तरह आराधना, मान मनवार और इच्छा पूर्ति करते है। बदले में स्थापित पितृ परिवार की सुख, समृद्धि में सहयोगी बनते है, ऐसी मान्यता है।ऐसी ही पितृ पूजा का जयपुर में साक्षी बना शाइनिंग टाइम्स। भांकरोटा क्षेत्र में द्वारिका अनुकम्पा में निवास करने वाले राठौड़ परिवार के पितृ के लिए जागरण 14 जनवरी को विनायक स्थापना के साथ शुरू हुआ। 17 जनवरी को हल्दी, मेहंदी की रस्म और महिला संगीत के बाद पितृ का आह्वान किया गया।
सर्प रूप पितृ ने अपने परिजनों से सुख दुःख की वार्तालाप की। अगले दिन पितृ की गद्दी, तलवार, साफा सहित प्रतीक रूपों को अश्वारूढ़ कर कलश यात्रा में परिवारजनों ने नाच गान के साथ अपने पितृ को अनुभूत किया। छप्पन भोग के साथ फिर पितृ का आह्वान किया। पांच दिन के पितृ के जागरण और उत्सव के इस मौके पर पितृ को परिवार के सजीव सदस्य के रूप में सभी ने अनुभूत किया।
ये सभी दृष्टांत तर्क और बौद्धिकता से इतर है। बुद्धिशाली इसे नकार सकते है लेकिन पितृ को जीवित रूप में अनुभूत करने वाले परिवारजन आत्मा के अमरत्व की मान्यता को मजबूती से धारण कर अनुभूत रहते है। अपनी जिजीविषा का पितृ शक्ति को आधार बनाते है।