आजादी का महोत्सव हम सभी भारतीयों के लिए अति विशेष त्यौहार है। यह त्यौहार हमें उस धटना का एहसास कराया है जब हमने राजा, महाराजा, जमींदार, मुस्लिम, मुगल, ब्रिटिश लोगों के शोषणकारी और तानाशाही राज के स्थान पर भागीदारी के शासन को अंगीकार किया था।
उसके बाद 26 जनवरी 1950 को हमारी भाग्य विधाता संविधान सभा ने ‘भारत का भारतीयों के लिए और भारतीयों द्रारा’ निर्मित संविधान को ह्रदयांगम किया था। इस दिन हम सभी को उस गणतंत्रात्मक आजादी की पहली बार अनुभूति हुई जिसके बगैर जीव मात्र अस्तित्व अपूर्ण है।
लेकिन आजादी के 78 साल बाद भी हर आम-ओ-खास भारतीय को कई बात यह आभास होता है कि हमें अभी पूर्ण स्वाधीनता की अनुभूति नहीं हुई है। कभी -कभी ऐसा लगता है मानों पहले हम विदेशी लोगों के गुलाम थे और अब अपने ही लोगों के ‘दास’ हो गए है। मानों गोरी चमड़ी वालो की जगह हमसे मिलती-जुलती सांवली चमड़ी वाले लोगों ने हमें अपने कब्जे में ले लिया है।
हमारे अपने कुछ गैर जिम्मेदार समाज के नेताओं व राजनेताओं ने हमें जाति, क्षेत्र, संप्रदाय, धर्म, आरक्षण के नाम पर बिखेर दिया है। कई मर्तबा प्रशासन का रेड कार्पेट की ‘अंग्रेजीयत’ का रवैया वैसा ही झलकता है। कई बात पुलिस की वैसी ही बर्बर शैली से आम आदमी पीड़ित होता नजर आता है।
शिक्षा मानों महंगी स्कूल में कैद हो गई है। पढ़ाई जैसे सरकारी मुलाजित बनने का जरिया बन गई है। ज्ञान-संस्कार-संचेतना व सजगता से शिक्षा का मानों कोई वास्ता नहीं रहा।
कई राजनेताओं व अधिकारियों का आचरण ऐसा हो गया है कि कई बार आप आदमी की यह धारणा बलवती होती जा रही है कि बिना ‘पैसा’ खिलाए कुछ नहीं हो सकता। हम भ्र्ष्ट आचरण, पिछड़ेपन, अलगाववाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, नस्लवाद, आर्थिक असमानता आदि से त्रस्त है। राज, राजनीति, प्रशासन, मीडिया, धर्म व्यवस्था, न्याय वयवस्था, समाज आदि का बड़ा हिस्सा देश की इस बदहाली के लिए थोड़ा-ज्यादा जिम्मेदार महसूस होता है।
दिखावे का जशन मनाना हमें छोड़ना होगा। आइए एक बात फिर बिगुल बजाते है सम्पूर्ण स्वाधीनता अनुभूति का। एक बात फिर हुंकार भरते है ‘यह धरती भी मेरी, यह आसमान भी मेराः यह जहान भी मेरा’ के नारे का।
स्वाधीनता अनुभूति की यह लड़ाई इस बार एक ‘मोहनदास’ के बल पर नहीं जीती जा सकती। उस समय दुश्मन एक था और वो भी बाहरी। इस बार हमारे ही कई लोगों का मजमा हमारे सामने है।
इसलिए हम सभी को ‘मोहनदास’ बनना होगा। हमें हमारे अधिकार पहचानने होंगे उनकी अनुभूति भी करनी होगी साथ ही उनके लिए लड़ने का माद्दा भी रखना होगा।
सच को न केवल बेवाक बोलना होगा बल्कि सच के लिए निडरता से लड़ना होगा। निज स्वार्थ को छोड़ना होगा। परिवार, समाज, धर्म, जाति जैसी कई सीमाओं को लांघना होगा। कृष्ण की तरह अधर्म के सामने आँखे मिलाकर खड़ा होगा। धर्म का मृत्यु तक साथ देना होगा। आँखों पर बंधी अन्धविश्वास की पट्टी उतारकर सचेत होना होगा। भावनाओं को छोड़ परिपक्वता की मिसाल देनी होगी।
